कंचन दा नहीं रहे! उनके न रहने के दो दिन बाद उन्हें श्रंद्धांजली लिखना, एक यातना की तरह है। उनसे इस बीच बात किये साल से ऊपर गुजर चुका था। वह लंबे समय से बीमार थे। मेरी अंतिम मुलाकात कोलकाता में हुई थी। उस समय वह जादवपुर विश्वविद्यालय के पास के एक मुहल्ले में रह रहे थे। उस समय तक मेरे द्वारा संपादित पत्रिका ‘भोर’ चार अंक निकलने के बाद बंद हो चुकी थी।
उस समय कुल दो दिन की उनसे मुलाकात और जो बातचीत हुई वह उनके दिल्ली में रहते हुए कुल बातचीत से अधिक थी।
उस मुलाकात में मैं उनसे नक्सलबाड़ी और क्रांतिकारी धारा में आने वाले कवि और साहित्यकारों, खासकर हिंदी क्षेत्र के साहित्यकारों की सूची बना रहा था जो गुमनामी में चले गये या जिनके लेखन का छोटा सा हिस्सा ही प्रकाश में आया, बाकी अंधेरों में गुम होता गया।
नक्सलबाड़ी के बाद उठे आंदोलन में बहुत से कार्यकर्ता जेल गये। उन्होंने जेल की यातनाओं को सहते हुए लिखा लेकिन इस तरह के लेखन कथित मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन सके। इसका एक छोटा सा हिस्सा ही सामने आ सका।
इसके साथ ही, नक्सलबाड़ी साहित्य की धारा से जुड़े लेखन को संग्रहित करने को लेकर भी बात हुई। नक्सलबाड़ी साहित्य का लघु पत्रिकाओं के साथ काफी घनिष्ट संबंध रहा है। इस धारा से जुड़ी बहुत सी पत्रिकाएं प्रकाशित हुई और समय के साथ गुमनामी में चलती चली गईं। इस संदर्भ में ‘नक्सलबाड़ी साहित्य’ जैसे नामकरण और इसके औचित्य को लेकर भी लंबी बातचीत हुई थी।
यह मेरा दुर्भाग्य ही है कि इस दिशा में जिस तरह से काम करना था, वह नहीं हो पाया और आने वाले समय में इस दिशा में प्रयास करने के अवसर भी कम होते गये। इस दौरान जुटाई गई सामग्री भी बिखराव का शिकार हो गई। उस समय कंचन दा ने भारत की कई भाषाओं में लिखे गए नक्सलबाड़ी साहित्य को बंगला भाषा में अनुवाद कर छापने और वितरित करने के अपने प्रयासों को दिखाया। उन्होंने गदर के द्वारा लिखी गई ‘असीमित गान खान’ का पूरा अनुवाद बंगला में कर दिया था।
उपरोक्त बातों का उल्लेख कंचन दा के जीवन के उन संदर्भों से है जिसके प्रति वह समर्पित रहे और आजीवन उसका अभिन्न हिस्सा बने रहे। कंचन दा मूलतः बंगाल के रहने वाले थे और अपनी भाषा को प्यार करते थे और उसी में रमने के लिए वह दिल्ली से कोलकाता चले गये। उनकी जिंदगी की आधारभूमि बनारस शहर था। वह यहां रहते हुए राजकमल चैधरी जैसे हिंदी के ‘अराजक’ कवियों से काफी प्रभावित थे।
एलेन गिन्सबर्ग के काशी प्रवास और भारत में किये जा रहे भ्रमण के दौरान उसकी कविताओं ने युवा पीढ़ी को काफी प्रभावित किया। उस प्रभाव में आने वाले कंचन दा भी थे। एलेन गिन्सबर्ग का प्रभाव बंगाल के युवा कवियों पर काफी पड़ा। कोलकाता की ‘भूखी पीढ़ी’ का प्रभाव पटना, बनारस, इलाहाबाद, दिल्ली तक आया। कंचन दा इससे अछूते नहीं थे। मोहभंग का दौर जितना ही गहन होता गया, युवाओं में बेचैनी भरती गई।
नक्सलबाड़ी ने इस पीढ़ी को एक नई आवाज दे दी। कंचन दा नक्सलबाड़ी के युवा लेखक और सक्रिय कार्यकर्ता में बदल चुके थे। वे साहित्य को राजनीति से अलग करके नहीं देखते थे। वह साहित्य को सक्रिय जीवन का हिस्सा मानते थे। वे साहित्य से साहित्य की यात्रा के बीच में जनपक्षरता, सक्रियता और वर्गीय राजनीति को एक अहम हिस्सा मानते थे।
उन्होंने बनारस से ही ‘आमुख’ का प्रकाशन शुरू किया। उसे लेकर वह दिल्ली आये। दिल्ली से कोलकाता जाते हुए वह ‘आमुख’ को उससे जुड़े अन्य लोगों को सौंप गये। लेकिन, उनके जाने के बाद फिर कभी ‘आमुख’ प्रकाशित नहीं हो सका।
जिस समय मैं दिल्ली आया ही था, उस समय वह जाने की योजना बना रहे थे और कुछ ही समय बाद वह कोलकाता जा बसे।
उन्हें उनके समकालीन रचनाकारों में सबसे अधिक प्रभावित करने वाले न्गुगी वा थियांगो थे। वे दिल्ली में हुए एक सम्मेलन में उनसे मिल चुके थे और उनकी रचनाओं से पूरी तरह वाकिफ थे। वह उनकी ‘जड़ों की ओर वापसी’ की अवधारणा और इससे संदर्भित रचनाओं से काफी प्रभावित थे। उन्होंने न्गुगी वा थियांगो की तरह ही अपनी भाषा में लिखने का रास्ता चुना। वह कोलकाता में रहते हुए बांग्ला भाषा, वहां के जीवन में पूरी तरह रम गये थे।
कंचन दा नहीं रहे। उनसे खाली हुई जगह को भरने वाली अब वह आबोहवा नहीं है। लघु पत्रिकाओं के सबसे मजबूत स्तम्भ बने रहने वाले और आजीवन उस दिशा में काम करने वाले कंचन दा अपने पीछे एक बहुत मजबूत और समृद्ध साहित्य की परम्परा को छोड़कर गये हैं। जब तक जनपक्षधरता, संघर्ष और सर्जना बनी रहेगी, कंचन दा की परम्परा उसमें जिंदा रहेगी। अलविदा कंचन दा!